नई दिल्ली. बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता अशोक कुमार की छवि भले ही एक सदाबहार अभिनेता की रही है लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि वो फिल्म इंडस्ट्री के पहले ऐसे अभिनेता हुये जिन्होंने एंटी हीरो की भूमिका भी निभाई थी. उनके बारे में ऐसी कई बातें हैं जो अभी आम लोगों से कोसों दूर हैं. 13 अक्टूबर 1911 के दिन जन्में हिंदी फिल्‍मों के दादा मुनि यानी अशोक कुमार को लेकर ऐसे कई किस्से हैं, जिसे उनके जन्मदिन पर जानने की कोशिश होगी. 
 
दरअसल, अशोक कुमार कुमुद लाल यूं तो कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में लॉ पढ़ रहे थे, लेकिन सती की शादी के बाद से उनको सिनेमा में काम करने का मन होने लगा. जब कुमुद लाल ने अपने बहनोई शशाधर से कहा कि वो फिल्मों में काम करना चाहते हैं तो उन्होंने बुला लिया उसे मुम्बई. कुमुद लाल हीरो बनने के ख्वाहिशमंद नहीं थे, पर्दे की भी ख्वाहिश नहीं थी, उनका तो मन था टेक्नीशियन बनने का. हिमांशु राय से कहा तो कुमद लाल को बॉम्बे टॉकीज में जॉब भी मिल गई, वो भी लैब असिस्टेंट की जॉब. ऐसे में अचानक से कुमुद लाल हीरो अशोक कुमार कैसे बन गए, इसकी कहानी वाकई में दिलचस्प है कि कैसे एक हीरोइन के किसी से अफेयर ने उनके बड़े परदे पर हीरो बनने के रास्ते खोल दिए.
 
ये हीरोइन थीं हिमांशु राय की पत्नी मशहूर एक्ट्रेस देविका रानी और उनके साथ जिस हीरो का अफेयर हुआ, उसका नाम था नजमुल हसन. ये बंदा इतना स्मार्ट था कि हिमांशु ने देखते ही उसे अपनी फिल्म ‘जवानी की हवा’ का हीरो बना दिया और हीरोइन थीं देविका रानी. पहली फिल्म से ही लंदन रिटर्न देविका हसन के नजदीक आ गईं. वैसे भी देविका शुरू से ही बोल्ड थीं. बॉलीवुड का पहला किस सीन उन्होंने अपने पति हिमांशु राय के साथ कर्मा फिल्म में किया था, जो पूरे चार मिनट का था. उन दिनों हीरो को तनख्वाह मिलती थी, देविका ने नजमुल को हिमांशु रॉय से कहकर दूसरी फिल्म भी दिलवा दी, वो भी अपने ही साथ, टाइटल था- जीवन नैय्या. इसी के साथ हिमांशु रॉय की जीवन नैय्या डगमगाने लगी. एक दिन देविका और नजमुल अचानक से दोनों गायब हो गए. बाद में कोलकाता के ग्रांड होटल में मिले. 
 
मशहूर लेखक सआदत हसन मंटो ने अपनी एक किताब गंजे फरिश्ते में इस घटना का जिक्र कुछ इस तरह किया है- ‘एस मुखर्जी जुबलीमेकर फिल्मसाज (अशोक कुमार के बहनोई) उन दिनों बम्बई टॉकीज में मिस्टर सावक वाचा साउंड इंजीनियर के असिस्टेंट थे. सिर्फ बंगाली होने की वजह से उन्हें हिमांशु राय से हमदर्दी थी. वह चाहते थे किसी ना किसी तरह से देविका रानी वापस आ जाए. उन्होंने अपने आका हिमांशु राय से मशविरा किए बगैर अपने तौर पर कोशिश की और अपनी मखसूस हिकमत-ए-अमली से देविका रानी को आमादा कर लिया कि वह कलकत्ते में अपने आशिक नज्मुल हसन की आगोश छोड़कर वापस बम्बई टॉकीज की आगोश में वापस चली आए. जिसमें उसके जौहर के पनपने की ज्यादा गुंजाइश थी.’
 
अब तो हिमांशु राय का गुस्सा उफान पर था. बीवी को तो उन्होंने माफ कर दिया, लेकिन नजमुल हसन को ना केवल फिल्म से निकाल दिया, बल्कि बाकी किसी स्टूडियो में भी उसे काम नहीं मिलने दिया. कुछ सीन जीवन नैय्या के शूट हो चुके थे, वो री-शूट होने थे, उससे पहले हीरो ढूंढना था. कोई कहता है शशाधर मुखर्जी ने नाम बढ़ाया, कोई कहता है बीवी को सबक सिखाने के लिए हिमांशु राय ने लैब असिस्टेंट कुमुद गांगुली को बुलाकर हीरो बना दिया. धोखा खाने के बाद अब वो एवरेज लुकिंग हीरो चाहते थे. हिमांशु ने उनका नाम भी बदल दिया, पहले देव कुमार ..फिर अशोक कुमार कर दिया. उस वक्त बॉलीवुड में नाम बदलने का काफी चलन था.
 
अशोक कुमार ने एक वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में कहा भी था- ‘मुझे उन दोनों पति पत्नी ने ग्रूम किया. मुझे इंग्लिश फिल्में देखने के लिए कहते थे. मेरे लिए उनकी टिकटें अरेंज करते थे. उन्हीं फिल्मों को देख-देख कर मैंने एक्टिंग करना सीखा.’ एवरेज दिखने और एवरेज से भी कम एक्टिंग की समझ वाले अशोक कुमार की तो निकल पड़ी. काम करने के दौरान ही उनको देविका के साथ अछूत कन्या भी मिल गई, जो उस वक्त सुपरहिट साबित हुई और अशोक कुमार की गाड़ी बॉलीवुड की गलियों में सरपट दौड़ पड़ी. वैसे दिलीप कुमार को फिल्मों में लाने का श्रेय भी देविका रानी को ही है. हिमांशु रॉय की मौत के बाद जब देविका रानी बॉम्बे टॉकीज छोड़कर विदेश चली गईं तो बॉम्बे टॉकीज शशाधर मुखर्जी ने ले लिया और फिर अशोक कुमार के साथ फिल्मिस्तान स्टूडियो भी शुरू कर दिया.
 
 
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