नई दिल्ली. बजरंगी भाईजान’ की देशभक्ति और पुरुषत्व की ठसक से भरी ‘बाहुबली’ के शोर के बीच नीरज घेवन की फिल्म ‘मसान’ का रिलीज होना ऐसा ही है जैसे बारिश भरी रातों में पड़ने वाली ओस की मौजूदगी. इस ओस से धरती के गीलेपन में कितना इजाफा होगा पता नहीं.. लेकिन, वह उन ढकी-छुपी जगहों तक नमी पहुंचा ही देती है जो अरसे से बिना पानी के बंजर होने की कगार तक पहुंच गई हैं. ऐसी फ़िल्में हिंदी सिनेमा के लंबे सफ़र की काली रातों में अलाव सी जलती हैं. 

‘मसान’ एक ऐसी जगह है जिसके आस-पास यह पूरी दुनिया रची हुई मालूम होती है. फिल्म परदे पर ही नहीं बल्कि सिनेमा हॉल में आपकी कुर्सी के दाएं-बाएं और आगे-पीछे भी घटित होती दिखती है. फिल्म देखते हुए आस-पास बैठे लोग किसी किरदार में खुद को महसूस कर हंस या रो देते हैं और चारों तरफ फैले इस मसान के ठीक बीच में आप खुद को खड़ा हुआ पाते हैं. एक ऐसी फिल्म जिसकी घटनाओं और कहानियों में आप किरदारों का हिस्सा हो जाते हैं और एक वक़्त के बाद उन्हीं के साथ हंसने-रोने लगते हैं. 

‘मसान’ का परिचय आपसे इस तरह से भी कराया जा सकता है कि फिल्म ने कांस फ़िल्म महोत्सव में दो अवॉर्ड जीते और स्क्रीनिंग में फिल्म को दर्शकों ने करीब पांच मिनट लंबी स्टैंडिंग ओवेशन भी दी. इस सबके बावजूद भारतीय शहरी सिने दर्शक जो खुद असल में जाने कितने मसानों से होते हुए आज एक बड़े शहर के सिनेमा हॉल तक पहुंचा है, फिल्म को देख कर जुड़ता ज़रूर है और खुद को इस मसान में मुर्दे जलाते हुए भी देखता है पर अभी वह उतना साहस नहीं जुटा पाता कि इस पर ताली पीट सके. फिल्म में सेक्स को लेकर एक भारतीय लड़की की क्युरीसिटी का उसके लिए सजा बन जाना, धार्मिक, लैंगिक, जातीय और आर्थिक असमानताओं के बीच पनपता समाज और प्रेम सबकुछ है. 

बहरहाल, फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं संजय मिश्रा, ऋचा चड्ढा, विकी कौशल, श्वेता त्रिपाठी और पंकज त्रिपाठी ने. फिल्म में सभी की अदाकारी बेहतरीन है और इसका पूरा श्रेय नीरज को ही दिया जाना लाज़िमी है. फिल्म वरुण ग्रोवर ने लिखी है और बनारस, इलाहबाद, गंगा-संगम इसमें इतना है कि आप इसमें पर्याप्त गोते लगा सकते हैं. फ़िल्म जगह से ज्यादा वहां के समाज को जीती है और इसलिए खुद के क़रीब मालूम पड़ती है. ऋचा चड्ढा और संजय मिश्रा के बीच का रिश्ता हो या विकी कौशल का प्रेमिका की मौत के बाद दहाड़े मार कर रोना, सब आपको पड़ोस के घर की घटना जैसी महसूस होती है. अविनाश- अरुण के बेहतरीन कैमरावर्क और इंडियन ओशन का म्यूजिक फिल्म को एक अलग मक़ाम पे ले जाता है. 

फिल्म आपके भीतर से रेल के जैसी गुजर जाती है और उसकी धड़-धड़ आप एक अरसे तक सुन सकेंगे इसकी गारंटी आपको नीरज की तरफ से मैं भी दे सकता हूं. चेतावनी है कि बजरंगी, बाहुबली जैसी फिल्मों के फैंस को थोड़ी निराशा होगी, क्योंकि उन्हें फिल्म में मजबूत कहानी झेलने की आदत नहीं है. फिल्म एक आम घटना है जो आस-पास सैंकड़ों की दर से घट रही है, फिल्म एक घाट पर सुस्ताती हुई सी ऐसी ही एक घटना को दर्ज करती है. आखिरी बात फिल्म में प्रेम है, दुःख है, रिश्ते हैं लेकिन हीरो-हीरोइन नहीं है. फिल्म ‘हरिश्चंद्र घाट पर जलता मुर्दा’ है जो ‘मुक्ति’ भी है और ‘भ्रम’ भी…

कलाकार: रिचा चड्ढा, संजय मिश्रा, विकी कौशल, श्वेता त्रिपाठी, पंकज त्रिपाठी, निखिल साहनी 
निर्देशन: नीरज घेवान
कहानी: नीरज घेवान, वरुण ग्रोवर
गीत: मयूर पुरी, कौसर मुनीर, शब्बीर अहमद, नीलेश मिसरा
अवधि- 115 मिनट