नई दिल्ली. नेपाल में आए भूकंप से मची त्रासदी के बीच भारतीय आपदा प्रबंधन विभाग ने भारत के लिए भी सचेत रहने की चेतावनी दी है. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विभाग ने भूकंप से सतर्कता संबंधी कुछ जरूरी बातें बताई हैं:
 
– अगर आप किसी इमारत के अंदर हैं तो फर्श पर बैठ जाएं और किसी मजबूत फर्नीचर के नीचे चले जाएं. यदि कोई मेज या ऐसा फर्नीचर न हो तो अपने चेहरे और सर को हाथों से ढंक लें और कमरे के किसी कोने में दुबककर बैठ जाएं.
 
-अगर आप इमारत से बाहर हैं तो इमारत, पेड़, खंभे और तारों से दूर हट जाएं.
 
– अगर आप किसी वाहन में सफर कर रहे हैं तो जितनी जल्दी हो सके वाहन रोक दें और वाहन के अंदर ही बैठे रहें.
 
-अगर आप मलबे के ढेर में दब गए हैं तो माचिस कभी न जलाएं, न तो हिलें और न ही किसी चीज को धक्का दें.
 
-मलबे में दबे होने की स्थिति में किसी पाइप या दीवार पर हल्के-हल्के थपथपाएं, जिससे कि बचावकर्मी आपकी स्थिति समझ सकें. अगर आपके पास कोई सीटी हो तो उसे बजाएं.
 
कोई चारा न होने की स्थिति में ही शोर मचाएं. शोर मचाने से आपकी सांसों में दमघोंटू धूल और गर्द जा सकती है.
 
– अपने घर में हमेशा आपदा राहत किट तैयार रखें.
 
भूकंप आता कैसे है?
पृथ्वी की बाहरी सतह सात प्रमुख एवं कई छोटी पट्टियों में बंटी होती है. 50 से 100 किलोमीटर तक की मोटाई की ये परतें लगातार घूमती रहती हैं. इसके नीचे तरल पदार्थ लावा होता है और ये परतें (प्लेटें) इसी लावे पर तैरती रहती हैं और इनके टकराने से ऊर्जा निकलती है, जिसे भूकंप कहते हैं.
 
नेपाल में शनिवार को जहां भूकंप आया वह इंड्स-यारलंग क्षेत्र कहलाता है जहां करीब चार करोड़ वर्ष पहले भारतीय उपमहाद्वीप यूरेशियाई प्लेट से टकराया था. इसकी वजह से हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ. यह पर्वत आज भी प्रतिवर्ष एक सेंटीमीटर ऊपर ऊंचा उठ रहा है. काठमांडू घाटी के नीचे 300 मीटर की गहराई में काली मिट्टी है जो कि प्रागैतिहासिक झील का अवशेष है, जिसकी वजह से भूकंप की तीव्रता बढ़ी और जान-माल का व्यापक नुकसान हुआ. अध्ययनों से यह जाहिर हुआ है कि यहां मिट्टी के द्रवीकरण की वजह से बड़ा भूकंप आने का खतरा बना रहता है.
 
हिमालय के नीचे धरती की दो परतें हैं, जो आपस में सामंजस्य बिठाती हैं तो कंपन होता है. शनिवार को भी ऐसा ही हुआ. विशेषज्ञों का कहना है कि भूकंप के केंद्र से जो ऊर्जा निकलती है वह किसी परमाणु बम से कम नहीं होती. यह धरती की परतों को चीरते हुए सतह तक आती है. भारतीय उपमहाद्वीप की परतें 5.5 सेंटीमीटर की दर से उत्तर की ओर खिसक रही हैं. कई बार ये आपस में टकराती हैं. लगातार टक्कर से परतों की दबाव सहने की क्षमता खत्म होती जाती हैं. परतें टूटने के साथ उसके नीचे मौजूद ऊर्जा बाहर आने का रास्ता खोजती हैं. इस वजह से हिमालय क्षेत्र में भूकंप आता है.
 
भारतीय उपमहाद्वीप को भूकंप के खतरे के लिहाज से सीसमिक जोन 2,3,4,5 जोन में बांटा गया है. पांचवा जोन सबसे ज्यादा खतरे वाला माना जाता है. पश्चिमी और केंद्रीय हिमालय क्षेत्र से जुड़े कश्मीर, पूर्वोत्तर और कच्छ का रण इस क्षेत्र में आते हैं.

IANS से भी इनपुट