पटना. जनसंघ हो या फिर बीजेपी, बिहार में बीजेपी का सियासी सफर काफी सुखद रहा है. यूं तो बीजेपी, बिहार की सत्ता में कई बार भागीदार बनी है लेकिन आज तक बिहार की सियासी बिसात पर बीजेपी का कोई मुख्यमंत्री काबिज नहीं हो पाया है. इस बार के चुनाव में अगर एनडीए की जीत होती है तो इतना तो तय है कि सीएम पद पर बीजेपी का ही कोई नेता काबिज होगा. हालांकि अभी तक बीजेपी ने अपना कोई सीएम उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. साल 1962 के चुनाव में जनसंघ के तीन विधायक जीते थे जबकि साल 2010 के चुनाव में बीजेपी के 91 विधायकों ने जीत दर्ज की थी. इतना ही नहीं साल 2010 में बीजेपी को रिकोर्ड 16.46 फीसदी वोट मिले थे.

साल 1962 के बाद बढ़ा जनाधार

साल 1962 के बाद बीजेपी का सियासी ग्राफ हर चुनाव में बढ़ता गया. बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता और बीजेपी के वरिष्ठ नेता नंदकिशोर यादव कहते हैं, ‘ बीजेपी शुरु से ही विकास की राजनीति पर विश्वास करती है. बिहार की राजनीति जातीय ध्रुव के इर्द-गिर्द घूमती रही है. यही कारण है कि बीजेपी को मतदाताओं ने पसंद किया है’ साल 1962 के उस दौर में कांग्रेस की लोकप्रियता चरम पर थी और वही पार्टियां कांग्रेस से मुकाबले कर पाई जिन्होंने सामाजिक असमानता का मुद्दा उठाया था. बीजेपी ने 20 सालों तक अविभाजित बिहार में कांग्रेस के मजबूत माने जाने वाले आदिवासियों के वोट बैंक में सेंध लगा ली और इन इलाकों में बीजेपी की जमीन मजबूत होती गई.

जनता पार्टी से बनी भारतीय जनता पार्टी

जनसंघ ने साल 1967 में 272 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, इस चुनाव में जनसंघ को 26 सीटों पर जीत मिली. इसमें ज्यादातर सीटें आदिवासी इलाकों की थी. जनसंघ ने 1969 में 34 और 1972 के विधानसभा चुनावों में 25 सीटें जीती थी. तब बीजेपी जनसंघ के नाम से जानी जाती थी. गैर-कांग्रेसी दलों के बड़े राजनीतिक प्रयोग के तौर पर जनता पार्टी के असफल होने के बाद साल 1980 में जनसंघ बीजेपी के रूप में अस्तित्व में आया.

साल 1980 के बाद बिहार में बीजेपी की स्थिति

बिहार में साल 1980 में हुए चुनाव में पार्टी ने 21 सीटों पर कब्जा किया लेकिन इससे अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ 16 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई. लेकिन इसके बाद चुनाव दर चुनाव बीजेपी की सीटों में इजाफा होता गया. साल 1990 के चुनाव में बीजेपी ने 39 सीटें जीती और 1995 में 41 सीटों पर जीत दर्ज की.

बीजेपी का गठबंधन की राजनीति में कदम

विधानसभा चुनावों में बीजेपी के विधायकों की संख्या तो बढ़ती गई लेकिन पार्टी अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंच पाई. जिसके बाद बीजेपी ने गठबंधन की राजनीति में कदम रखा. साल 2000 के चुनाव में बीजेपी ने समता पार्टी के साथ मिलकर 168 सीटों पर चुनाव लड़ा और 67 सीटें अपने नाम कर ली. लेकिन इसी दौरान बिहार विभाजन ने बीजेपी के 32 विधायकों को झारखंड भेज दिया. जिसके बाद बीजेपी को झारखंड में तो लाभ मिला लेकिन बिहार में नुकसान हुआ और पार्टी के पास बिहार में 35 विधायक ही रह गए.

जेडीयू के साथ गठबंधन

झारखंड के अलग होने के बाद साल 2005 के चुनाव में बीजेपी, जनता दल (युनाइटेड) के साथ मिलकर चुनाव लड़ी. इस चुनाव में बीजेपी को 37 सीटों पर जीत मिली और इसी साल अक्टूबर में हुए चुनाव में 55 सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की. सीटों के इजाफा का ये सिलसिला 2010 में भी जारी रहा और बीजेपी ने 102 सीटों पर चुनाव लड़कर 91 सीटें अपने खाते में कर लीं. इस जीत ने बीजेपी को सत्ता में तो भागीदार बना दिया लेकिन सीएम की कुर्सी की शोभा बीजेपी के नेता नहीं बल्कि जेडीयू के नेता ने बढ़ाई.

बिहार चुनाव में अलग है स्थिति

साल 2015 के इन चुनावों में बीजेपी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा), राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) और हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के साथ एनडीए के बैनर तले चुनाव मैदान में उतरी है. इस चुनाव में बीजेपी ने 160 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है.