पटना. लोकसभा चुनाव के बाद इस साल सितंबर-अक्टूबर में बिहार में नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा होने वाली है. वहीं यह विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के लिए अस्तित्व की लड़ाई है. पिछले कुछ वर्षों में सीएम नीतीश कुमार ने विकास पुरुष की छवि बनाई है. लेकिन बिहार में ऐसे कई बड़े काम है जो नीतीश पिछले दस सालों में पूरा नहीं कर पाए.

आइये जानते हैं सीएम नीतीश कुमार की दस बड़ी असफलताएं

अयोग्य शिक्षकों की बहाली- लाखों बहाली के बावजूद शिक्षकों और ख़ासकर योग्य शिक्षकों की अभी भी भारी कमी है. बिहार के स्कूलों में शिक्षकों के पढ़ाने और बच्चों के सीखने का स्तर, गुणवत्ता के लिहाज से बहुत नीचे है.

निवेश का माहौल गढ़ने में असफल- पिछले 8 सालों में राज्य सरकार के पास निवेश के काफी प्रस्ताव आए, लेकिन जमीन की किल्लत की वजह से इनमें से ज्यादातर प्रस्ताव जमीनी शक्ल नहीं पा सके. इस किल्लत की वजह से राज्य सरकार को कुछ दिनों पहले 2.25 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के निवेश प्रस्ताव खारिज करने पड़े थे.

डॉक्टरों की कमी- एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार में पिछले 15 वर्षों में महज 600 डॉक्टरों की नियमित बहाली हो पाई है. भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) ने डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे राज्य के चार मेडिकल कॉलेजों को नए बैच शुरू करने की अनुमति नहीं दी. जबकि राज्य सरकार की ओर से भेजे गए नए मेडिकल कॉलेज खोलने के चार प्रस्ताव भी अस्वीकार कर दिए गए हैं. सात पुराने कॉलेजों में सीटें बढ़ाने से भी एमसीआई ने मना कर दिया है.

उद्योगों को मुश्किलें- बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकार (बियाडा) की जमीन पर उद्योग लगाने के लिए प्रस्तावित कई योजनाएं मुकदमों में उलझी हैं. बियाडा की जमीन पर आवंटन के छह महीने के भीतर यदि प्लांट नहीं लगाया गया और उत्पादन शुरू नहीं किया गया तो जमीन का आवंटन रद्द हो जाएगा. निष्क्रिय अफसरशाही से राज्य में उद्योग नहीं लग पा रहे हैं. राज्य निवेश प्रोत्साहन बोर्ड ने अभी तक 1891 प्रस्तावों को मंजूरी दी है. उनमें से 1619 इकाईयों ने काम नहीं शुरू किया है.

सिंचाई में कमी- लाखों हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई की व्यवस्था नहीं है. बिहार भारत का दूसरा सबसे बड़ी आबादी वाला गरीब राज्य है, जहां अधिकांश आबादी समुचित सिंचाई के अभाव में मॉनसून, बाढ़ और सूखे के बीच निम्न उत्पादकता वाली खेती पर अपनी जीविका के लिए निर्भर है.

भूमि सुधार- एक रिपोर्ट के अनुसार कृषियोग्य भूमि रखनेवाले किसानों में छोटे और सीमांत किसान 96.5 फ़ीसदी हैं. इनके पास ज़मीन 66 फ़ीसदी ही है. मध्यम और बड़े किसान केवल 3.5 प्रतिशत हैं, पर वे 33 फ़ीसदी जमीन के मालिक हैं. बड़े किसान केवल 0.1 प्रतिशत हैं. पर, ज़मीन उनके पास 4.63 फ़ीसदी (19.76 लाख एकड़) है. यह कृषि संबंधी विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधक है.

पुलिस रिफॉर्म- पूरे देश में आबादी के हिसाब से सबसे कम पुलिस बल बिहार में है. साथ ही पुलिस बल के आधुनिकीकरण नहीं होने के कारण बिहार पुलिस को स्मार्ट नहीं माना जाता है.शहरीकरण के लिए योजनाएं नहीं- बिहार की राजधानी पटना को भी स्मार्ट सिटी के रूप में रखा नहीं जा सकता. देश में शहरीकरण का प्रतिशत 30 से ज्यादा है, जबकि बिहार में यह प्रतिशत मात्र 11 है.

न्याय मिलने में देरी- पिछले दस सालों में जजों की नियुक्ति के लिए कोई परीक्षा नहीं हुई है. कोर्ट में जजों का अभाव है. लाखों मुकदमे लंबित पड़े हैं और लोगों को न्याय नहीं मिल रहा है.विस्थापन- शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी क्षेत्र का ना होना बिहार में विस्थापन की बड़ी वजह है. हर साल लाखों बच्चे उच्च शिक्षा के लिए बिहार से अन्य प्रदेशों में जा रहे हैं. साथ ही, असाध्य बीमारी के इलाज की असुविधा के चलते लोगों को बाहर का रूख करना पड़ता है.