पटना. किसी ने सच कहा है कि राजनीति में दो और दो मिलाने से चार नहीं होते. राजनीति गणित नहीं है बल्कि यह केमिस्ट्री की तरह होती है, जहां दो लोगों के मिलने और अलग होने का परिणाम कुछ भी हो सकता है. बिहार विधान परिषद के चुनावी नतीजों ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सोचने पर मजबूर कर दिया होगा कि लालू प्रसाद यादव का उन्हें क्या फायदा मिला. हाल में ही जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस महागठबंधन का चेहरा बनने वाले नीतीश को विधान परिषद चुनाव में करारी हार झेलनी पड़ी है.

नीतीश के नेतृत्व में इस गठबंधन को 24 में से 10 सीटें आई हैं. जबकि दूसरी ओर आरोपों से बुरी तरह घिरी बीजेपी ने अकेले 12 सीटें जीती हैं. खास बात यह है कि पिछली बार 24 में 15 सीटें नीतीश के जेडीयू के पास थी. जबकि लालू के पास 4 सीटें थीं. लालू यादव की पार्टी इस बार भी 3 सीटें जीतने में कामयाब रही. यानि नतीजों से साफ है कि नीतीश को नुकसान हुआ है और लालू की पकड़ कमजोर हुई है.

पटना सीट से जेल में बंद निर्दलीय रीतलाल यादव ने परचम लहराया है. इस सीट पर जेडीयू के प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहे जो सिटिंग एमएलसी थे. लोकसभा चुनाव के समय अपनी बेटी मीसा भारती को चुनाव जितवाने के लिए आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद रीतलाल के परिवार वालों से घर पर जाकर मिले थे.

इसके बाद मीसा के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान करने वाले रीतलाल ने आरजेडी का समर्थन किया था. इसके बावजूद उस सीट से कभी लालू के खास रहे रामकृपाल यादव ने बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल की. इसके अलावा लालू के मजबूत गढ़ सारण और गोपालगंज में भी आरजेडी को करारी हार का सामना करना पड़ा.

बिहार विधान परिषद के चुनावी नतीजों के बाद यह साफ हो गया है कि लालू प्रसाद का लोकसभा में मिले वोटों की संख्या के आधार गठबंधन में अधिक सीटें लेने का दावा कमजोर होगा. चुनाव नतीजों से बीजेपी को राहत मिलेगी.

पिछले कुछ दिनों से रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा गठबंधन में सीटों को लेकर बीजेपी पर दबाव बनाने में लगी थी. इस चुनाव में बीजेपी ने दोनों दलों को 6 सीटें दी थी लेकिन एलजेपी का एक ही उम्मीदवार जीतने में सफल रहा. रामविलास के खुद के किले हाजीपुर में आरजेडी के सुबोध कुमार ने सेंध लगा दी है. हाजीपुर के अलावा नालंदा सीट पर भी एलजेपी उम्मीदवार रंजीत डॉन की करारी हार हुई है. सीएम पद की मांग करने वाली उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा का तो खाता ही नही खुला.

लोकसभा चुनाव में बीजेपी से अलग होकर लड़ने वाले नीतीश की पार्टी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था. बिहार में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को 40 में से 31 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. नीतीश को सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा था.

इसके बाद दो दशक तक लालू के विरोधी रहे नीतीश ने उनसे हाथ मिलाया. इसका फायदा नीतीश को अगस्त 2014 में बिहार विधानसभा के उप चुनाव में मिला. 10 सीटों पर हुए उप-चुनाव में आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस ने 6 सीटों पर कब्जा जमाया और बीजेपी को चार सीटों से संतोष करना पड़ा. उसके बाद नीतीश और लालू इस बात पर सहमत हए कि अगर दोनों साथ में लड़ें तो बीजेपी को रोका जा सकता है.

इसके बाद सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के समधी बने लालू दोनों दलों के विलय पर राजी हो गए. आरजेडी के अंदर काफी मतभेद होने के बावजूद लालू ने बिहार में नीतीश को अपना नेता मान लिया.

दरअसल, लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में 29.9% वोट बीजेपी को और 6.5% वोट रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी को मिले थे. वहीं जेडीयू और आरजेडी दोनों ने मिलकर 36% वोट हासिल किए थे. इसी आधार पर एक-दूसरे के धुर विरोधी लालू-नीतीश ने मान लिया कि उनका भविष्य एक साथ आने से ही उज्ज्वल हो सकता है. लेकिन, जमीनी स्तर पर एक पार्टी का वोट दूसरी जगह ट्रांसफर होने में काफी मुश्किलें आती हैं. यह बात शायद नीतीश अब समझ रहे होंगे.

बिहार में अक्टूबर-नवबंर में विधानसभा चुनाव होने हैं. बिहार में अब अगड़ी-पिछड़ी राजनीति से बीजेपी को मात देना मुश्किल होगा. पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखने वाले सुशील मोदी पिछले दो दशक से बिहार में बीजेपी का चेहरा हैं. इसके अलावा विधानसभा में नेता विपक्ष नंदकिशोर यादव हैं. साथ ही, बीजेपी ने यादव वोटों के मद्देनजर भूपेंद्र यादव को बिहार का प्रभारी बनाया हुआ है.

चुनाव से पहले जातीय कार्ड खेलते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कह दिया कि बीजेपी ने देश को पहला ओबीसी प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) दिया है. इसके अलावा बीजेपी लालू-नीतीश के साथ आने पर ‘जंगलराज’ के दिनों की याद दिला रही है.

शायद इन्हीं कारणों से नीतीश कुमार अपनी विकास वाली छवि के साथ चुनाव में उतरने की तैयारी में हैं. मजेदार बात यह है कि पीएम पद के लिए नरेंद्र मोदी का चुनावी अभियान चलाने वाले प्रशांत किशोर अब नीतीश की छवि की चमका रहे हैं. बिहार में अब नीतीश कुमार को नए सिरे से सोचना होगा.

हालांकि, इस चुनावी नतीजे से बीजेपी को उत्साहित या नीतीश को हताश होने की बहुत जरूरत नहीं है क्योंकि विधान परिषद चुनाव में मुखिया, वार्ड मेंबर, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, विधायक और सांसद वोटर होते हैं. इनकी कुल संख्या करीब एक लाख 40 हजार है, जबकि विधानसभा चुनाव में करोड़ों वोटर होंगे.

लेकिन, इस चुनाव में वोटर वो लोग होते हैं जिनका अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव होता है. इस चुनाव के वोटर सामान्य वोटरों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. नीतीश-लालू के पास अभी तीन महीने का समय शेष है. देखना दिलचस्प होगा कि ये क्या रणनीति बनाते हैं.