नई दिल्ली. अन्न को शास्त्रों में प्राण की संज्ञा दी गई है. अन्न को प्राण कहने में न तो कोई अयुक्त है और न अत्युक्ति, निःसन्देह वह प्राण ही है. भोजन के तत्वों से ही शरीर में जीवनी शक्ति का निर्माण होता है. उसी से मांस, रक्त, मज्जा, अस्थि और ओजवीर्य आदि का निर्माण हुआ करता है. भोजन के अभाव में इन आवश्यक तत्वों का निर्माण रुक जाये तो शरीर शीघ्र ही स्वत्वहीन होकर स्तब्ध हो जाए.
 
गीता में कहा गया है कि उत्तम मनुष्य को बासी, दूषित और मन को विचलित करने वाले आहार से बचना चाहिए इसलिए पवित्र भोजन ग्रहण करें. शास्त्रों में किसी का जूठा खाने पर भी बड़ा बैन है. जिसके कारण तन और मन पर बहुत सारे दुष्प्रभाव पड़ते हैं. भोजन करने के और उपाय बताएंगे अध्यात्मिक गुरु पवन सिन्हा इंडिया न्यूज के शो भारत पर्व में 
 
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