नई दिल्ली. 1993 में हुए मुंबई सीरियल ब्लास्ट के गुनहगार याकूब मेमन को गुरुवार सुबह नागपुर जेल में फांसी दे दी गई. याकूब मेमन के मामले ने हिंदुस्तान की न्याय व्यवस्था में एक इतिहास लिख दिया.

250 से ज्यादा लोगों की मौत के जिम्मेदार शख्स की सुनवाई के लिए आधी रात को देश की सर्वोच्च अदालत की बत्तियां जलाई गईं. याकूब के हक में कानून की हर बारीकी को छाना गया, तब जाकर उसे उसके गुनाहों की सजा दी गई लेकिन दुनिया में याकूब की फांसी को लेकर सवाल उठ रहे हैं. मानवाधिकारों की दुहाई देकर याकूब की फांसी को गलत ठहराया जा रहा है.

अब सवाल उठता है कि मानवाधिकारों के नाम पर बौद्धिक बहस करने वालों को मासूमों के मानवाधिकार क्यों नहीं दिखाई देते ? जिन लोगों ने आतंकियों की बेरहम साजिशों में अपनी जान गंवा दी, क्या उनका अपनी जिंदगी जीने का अधिकार नहीं था. उनके मानवाधिकार के लिए कोई, क्यों नहीं बोलता ?

इसी पर देखिए चर्चा बीच बहस में: